:
Breaking News

Banda - बंदूकों और दस्युओं का बीहड़ बीती बात,अब पर्यटन विकास की है आस

top-news
https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है कभी मिनी पाठा के नाम से मशहूर रहा कोल्हुआ वन क्षेत्र 


रिपोर्ट - यूसुफ खान राना 

बांदा । - कोल्हुआ जंगल का जिक्र आते ही बागी, बंदूक और बीहड़ के दृश्य सामने आने लगते है। क्षेत्र में कभी कुख्यात दस्युओं की शरणस्थली के रूप में कोल्हुआ वन क्षेत्र की पहचान बीहड़ और डकैतों के पनाहगाह रूप में होती थी। वजह थी कि बांदा-चित्रकूट जिले की भौगोलिक स्थिति ने बागियों को इन जंगलों व बीहड़ में खूब पनाह दी। दस्यु दलों का आतंक जिलें ही नहीं बल्कि पड़ोसी जिले चित्रकूट, प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर व पड़ोसी राज्य एमपी के रीवा, सतना, पन्ना, छतरपुर तक रहा। हालांकि अब यहां की आबोहवा बदल चुकी है। पुलिस के लगातार अभियानों ने बांदा व चित्रकूट जिले में दस्युओं के आतंक का खात्मा सा कर दिया है। बीते डेढ़ दशक में बड़े और छोटे दस्युओं को या तो मार दिए गए हैं या फिर जेल की शिकंजों के पीछे पहुंच चुके है। अब जंगल व बीहड़ पिछले कुछ समय से प्राकृतिक प्रेमियों के लिए पर्यटन स्थली बन गई है।

फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने कि थी पिछले वर्ष अपनी फिल्म की शूटिंग

एक ऐसा जंगल, जिसमें जानवर नहीं, कभी डाकुओं की झुंड रहती थी, एक ऐसा जंगल, जिसमें पेड़ से ज्यादा लाशें पड़ी रहती थीं, एक ऐसा जंगल, जो आपकी गर्मी नहीं बुझाता, आपको प्यासा बनाता है, प्यासा प्रतिशोध का, प्यासा प्रताड़ना का, प्यासा प्रतिष्ठा का, प्यासा सम्मान का, नाम है कोल्हुआ, 
इस जंगल ने ददुआ से लेकर ठोकियां तक राजा रगौली से लेकर बुद्दा तक, रागिया से लेकर बलखड़िया तक बबुली कोल से लेकर गौरी यादव, पप्पू यादव व धर्मा तक, न जाने कितने डाकुओं का दंश इस जंगल ने झेला है। न जाने जिंदा जलती हुई कितनी लाशों का प्रत्यक्षदर्शी है।
ये वो जंगल है जिसमें न जाने जुर्म की दुनिया के कितने किस्से दफ्न हैं, ये वो कोल्हुआ जंगल है जिसका इक समय नाम आते ही अच्छे अच्छों की पेशाब छूट जाती थी। आज़ भी ज़हन में खूंखार डाकू और डाकुओं के किस्से अंतर्मन में तैर जाते हैं। बांदा-चित्रकूट सहित मध्य प्रदेश की सीमाओं को छूता हुआ ये जंगल पिछले कई सालों तक समाज और कानून के लिए खतरा बना रहा है। लेकिन अब परिदृश्य बदल रहा है जहां पहले डकैतों की गोलियों की तड़ तड़ाहट गूंजती थी, अब वहां गूंज रहा है लाइट... कैमरा... एक्शन... जैसे शब्द । फिल्म निर्देशक तिग्मांशु धूलिया के निर्देशन में बागी दस्यु ददुआ की एसटीएफ आप्रेशन पर आधारित "घमासान" फिल्म की शूटिंग हुई जिसमें फिल्म अभिनेता अरशद वारसी, राजपाल यादव व प्रतीक गांधी ने इस जंगल में रहकर फिल्म शूटिंग की।

विलेज टूरिज्म से ग्रामीण पर्यटन का खुल सकता है नया रास्ता

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट व वीरांगना दुर्गावती की जन्मस्थली बांदा का यह क्षेत्र पर्यटन का बड़ा ठिकाना बन सकता है। जंगल, झरनों और पहाड़ों से रचे बसे इस क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। दहशत के बादल छंटने के बाद छिपी हुई खूबसूरती निखरने लगी है जंगल क्षेत्र में छुपे हुए प्राकृतिक ख़ज़ानों को संरक्षित कर पर्यटन के लिहाज से कायाकल्प कर अगर प्राकृतिक प्रेमियों को सुलभ सेवाएं उपलब्ध करा प्रेरित किया जाए तो गांवों में "विलेज होम स्टे" योजना चलाकर स्थानीय युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा कर पलायन को भी रोका जा सकता है।

https://maannews.acnoo.com/public/frontend/img/header-adds/adds.jpg

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *